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हमारे कितने सुनहले दिन थे वो. जीवन का सारा ख़ुशी मिल रहा था. क्यों की मैं एक लड़की से प्यार करता था. और वह मुझसे 100 गुना ज्यादा प्यार करती थी. हमारे दिन ऐसे कट रहे थे जैसे कोई सुनहला सपना सच हो रहा हो. मेरे लाइफ की सबसे खुबशुरत चीज थी वो.

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sastro ke anu sar diwali

शास्त्रों के अनुसार दिवाली के दिन ही अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे. अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं

दिवाली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दिवाली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दिवाली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

diwali ek parba pyar ka

दीवाली या दीपावली अर्थात “रोशनी का त्योहार” शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है। दीपावली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।

भारत में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दिवाली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं.

diwali ke bad unse pyar umda

तेरहवां गोलगप्पा – मैंने दिवाली के बाद तुझसे पूछा था हिम्मत जुटाकर कि क्या तुम्हारा कोई बॉय फ्रेंड है।तुमने कहा था- नहीं मैं ऐसी लड़की नहीं हूँ।
उस रात मैं बहुत खुश था ये सोचकर की तू कभी तो जानेगी कि तेरे लिए मैं भले ही कुछ भी हूँ मगर मेरे लिए तू वो है जिसके लिए मैं सांस लेता हूँ।
चौदहवां गोलगप्पा – आज कहो ना पयार है रिलीज हुई है और मैं पापा से पांच रुपये मांगने की जिद कर रहा हूँ। यह भी प्लान बना रहा हूँ कि तुझसे आज दिल की बात कह दूंगा।


पन्द्रहवां और आखिरी गोलगप्पा – मेरे दिल टूट चूका था और मुहं में गोलगप्पे का पानी था और चेहरे में अश्कों का।
दोस्तों अगर आपको ये Heart Touching Hindi love story- मेरी अधूरी प्रेम कहानी पसंद आई तो इसको जरूर शेयर करे । और आपके पास भी है ऐसी कोई कहानी तो भेज दीजिये हमे ! हम वो कहानी आपके नाम के साथ Ignored Post वेबसाइट पर प्रकाशित करेंगे । हमारी ईमेल आईडी

unse namila to me udas ho gaya

तीसरा गोलगप्पा- तूने सातवीं कक्षा के एनुअल फंक्शन में ‘अंखियों के झरोखे से’ गाना गाया था।
चौथा गोलगप्पा- उसी दिन की रात मेरे नयनो में तेरी छवि बस गई थी।
पांचवा गोलगप्पा- आठवी कक्षा के पहले दिन मैडम ने तुझे मेरे साथ बिठा दिया था।
छठा गोलगप्पा- मैं बहुत खुश था। तेरे बोलों से हेड एंड शोल्डर्स शैम्पू की खुशबू आती और मैं रोज़ उस खुशबू में खो जाता। यही कारण था मैं आठवी की अर्धवार्षिक परीक्षा में अंडा लाया था। और मैडम ने मुझे हडकाया था।
सातवाँ गोलगप्पा- मैं फेल हो गया था तो मैडम ने तुझे होशियार लड़की के साथ बिठा दिया था।


आँठवा गोलगप्पा – मैं उदास हो गया था। और मैंने 3 दिन तक खाना नहीं खाया था।
नौवा गोलगप्पा- मैं रोज़ छुट्टी के बाद तेरे घर तक तेरा पीछा किया करता था।
दसवां गोलगप्पा – मैं रोज़ सुबह और शाम तेरे घर के चक्कर काटता था इस उम्मीद की शायद तू घर कइ बाहर एक झलक मात्र के लिए ही सही दिख जाए।
ग्यारहवां गोलगप्पा – तूने मुझे एक दिन डांट दिया था कि छुट्टी के बाद मेरा पीछा मत किया करो। और उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा था, तबसे मैं दुसरे रास्ते से घर जाने लगा था।
बारहवां गोलगप्पा – हम नवीं कक्षा में पहुँच गए थे। दिवाली थी। कहो ना प्यार है के गाने रिलीज़ हो गए थे। मैं क्लास

film he hero jaisa dikhta tha wo

‘हाय ऋतिक रोशन!!!!’ कहते हुए तू उछल पड़ी और गोलगप्पा जमीन में फेंकते हुए मुझसे बोली-सॉरी अंकित आज किसी के साथ मूवी जाना है, कभी और।

और मैं समझ गया कि ये “किसी” कौन होगा।
ये कहते हुए तू बाइक में बैठ गई और उस लौंडे से चिपक गई, उसके सीने में अपने दोनों हाथ बांधे हुए।
तू आँखों से ओझल हुए जा रही थी और मुझे बस तेरी काली जुल्फें नज़र आ रही थी। उसी को देखता मेरे नेत्रों में कालिमा छा रही थी।


कैलाश भैय्या की भी आँखे भर आईं थी और मेरे दो नैना नीर बहा रहे थे।
कैलाश भैय्या- छोड़ो ना बाबू जी। ई लड़कियां होती ही ऐसी हैं। अईसा थोअड़े होअत है कि किसी के दिल को शीशे की तरह तोड़ दो।
ये कहकर उन्होंने कपड़ा उठाया जिससे वो पसीना पोछा करते थे और अपने आंसुओं को पोछने लगे। मैं भी रो पड़ा।
अभी 14 गोलगप्पे बचे थे और कैलाश भैय्या जिद कर रहे थे खाने की।
एक एक गोलगप्पा खाते खाते दिल फ्लैशबैक में जा रहा था।
दूसरा गोलगप्पा- तू सातवीं कक्षा में क्लास में नई नई आई थी आँखों में गाढ़ा काजल लगाकर और मेरी आगे वाली सीट में बैठ गई थी

jate huye mujhe rok diyatha wo

मैं जा ही रहा था तो तू आकर बोली- रुको मैं आउंगी पर तुम मुझसे 4 फीट दूर रहना….मैंने मुस्कुराते हुए कहा ठीक है…हम चलने लगे और मैं मन ही मन प्रफुल्लित हुए जा रहा ये सोचकर की तुझे तेरी मनपसंद चीज़ खिलाऊंगा और शायद इससे तेरे दिल के सागर में मेरे प्रति प्रेम की मछली गोते लगा ले…खैर गोलगप्पे की दुकान आई…मैं रुक गया…तूने जिज्ञासावस पूछा- रुके क्यूँ?

मैं- अरे! ज्योति तुम गोलगप्पे खाओगी ना इसलिए।
तू- अरे वाह!!!!!! जरुर खाऊँगी।

तेरी आँखों में चमक थी। और मेरी आत्मा को तृप्ति और अतुलनीय प्रसन्नता हो रही थी। तब १ रुपये के ३ गोलगप्पे आते थे।

मैं- कैलाश भैय्या ज़रा पांच के गोलगप्पे खिलवा दो।
कैलाश भैय्या- जी बाबू जी। (मुझे बुलाकर कान में) गरलफ्रंड हय का?
मैं(हँसते हुए)- ना ना भैया।आप भी
कैलाश भैय्या ने गोलगप्पे में पानी डालकर तुझे पकड़ाया ही था कि तू जोर से चिल्लाई- रवि…रवि
इतने में एक स्मार्ट सा लौंडा(शायद दुसरे स्कूल का) जिसके सामने मैं वो था जैसा शक्कर के सामने गुड लाल रंग की करिज्मा से हमारी तरफ आया और बाइक रोक के बोला- ज्योति मैं तुम्हारे स्कूल से ही आ रहा हूँ। चलो ‘कहो ना प्यार है के दो टिकट करवाए हैं जल्दी बैठो’

adure din ka pyar

वो दिन अभी भी याद आता है जब पापा से बहुत जिद करने के बाद 5 रूपए मांगे थे क्यूंकि क्लास में तुमने कहा था तुम्हे गोलगप्पे बहुत पसंद हैं…और मुझे तुम अच्छी लगती थीं…तुम्हारा और मेरा घर आजू बाजू था और रास्ते में ‘कैलाश गोलगप्पे वाला’ अपना ठेला लगाता था…घर जाने के दो रास्ते थे तुम दुसरे रास्ते जाती और मैं गोलगप्पे की दुकान वाले रास्ते…उस दिन बहुत खुश था…नेवी ब्लू रंग की स्कूल की पैंट की जेब में १ रुपये के पांच सिक्के खन खन करके खनक रहे थे और मैं खुद को बिल गेट्स समझ रहा था…शायद पांच रुपये मुझे पहली बार मिले थे और तुझे गोलगप्पे खिलाकर सरप्राइज भी तो देना था…


स्कूल की छुट्टी होने के बाद बड़ी हिम्मत जुटा कर तुमसे कहा- ज्योति, आज मेरे साथ मेरे रास्ते घर चलो ना? हांलाकि हम दोस्त थे पर इतने भी अच्छे नहीं कि तू मुझ पर ट्रस्ट कर लेती…’मैं नी आरी’ तूने गुस्से से कहा…’प्लीज चलो ना तुम्हे कुछ सरप्राइज देना है’…मैंने बहुत अपेक्षा से कहा…ये सुन के तू और भड़क गयी और जाने लगी क्यूंकि क्लास में मेरी इमेज बैकैत और लोफर लड़कों की थी…

ankh me asu the is ke bad

उसकी लाल-लाल आखें देखकर भी पसीज नहीं पाई. जो एक ही बात बोल रही थी. “ये तुम्हारे चलते हुआ है. मैं सोई नहीं रात भर. बस बरसती रही. सावन की तरह.”

गलत बाते कभी छिप नहीं पाती, मेरा बात उनको फिर मालूम हो गया.

“क्यों कर रही हो ऐसा? क्या चाहिए तुम्हे जो मैं नहीं दे रहा हूँ?” उसने अगले दिन मिलते ही पूछा.

“अब क्या कर दी?” मैं भी अनजान बनते हुई पूछी. गलती करने के बाद भी मैं उसे छुपाती रही.

“क्या तुमने कुछ नहीं किया? मै नहीं जनता हूँ जो कर रही हो” फिर उसने सारा चीज सामने रख दिया. और बोला – “अगर तुम यही करना चाहती हो तो करो, मन भर करो लो. जब मन भर जाये इस सब चीजो से. फिर मेरे पास आना, मैं तुमको वैसे ही मिलूँगा जैसे था.” उसकी आँखे भर आई थी. लेकिन मैं निलर्ज वैसे ही खड़ी रही , जैसे कुछ किया ही नहीं हो.

“सॉरी, अब नहीं होगा ऐसा. ये लास्ट टाइम. लास्ट टाइम माफ़ कर दो. इस बार हम दोनों अपना सिम change कर लेंगे.”

“number बदलने से कुछ नहीं होगा नियत बदलो. number कितना भी बदल लो और नियत बदलो ही नहीं तो क्या फायदा और ‘नियत ही अच्छा हो जाये तो number बदलने की क्या जरुरत.” उसने कहा.

jab wo roya tha mereliye

क्या हुआ था मुझे? मै क्यों ऐसा कर रही थी. मुझे खुद पता नहीं था. मेरी बुद्धि कुंद हो गई थी. ऐसा नहीं था की उस से प्यार नहीं था, प्यार तो उस से ही था. फिर भी दुसरे के तरफ attract होती गई. और ऐसे होती गई की उसके खुशियों का ख्याल ही नहीं रहा. उसका trust मुझ पर अपने आप से जयादा था. और मैं उसका trust तोड़ती रही, हर बार.


अभी भी वह दिन याद है जब रात भर रोया था. जब उसको किसी ने मेरे बारे में बताया- बातें करने और मिलने की. एक बार सोची की बता दू की मै धोखा दे रही हूँ. किसी और से भी बात कारती हूँ. मगर मैं एक बार फिर कमजोर हो गई. दुसरे दिन मिले तो मैंने साफ मना कर दिया. “मैं किसी से बात करती ही नहीं.”

ye sab mujhe kyu badal diya

मैं अब सपने में जी रही थी ऐसा सपना जो सच्चा था. उसे पाने, उसे अपना बनाने का. वह अब मेरा था. सिर्फ मेरा. हमलोग खूब मिलने लगे. सभी से बचकर-बचाकर. नहीं मिलने पर बेचैनी सी चढ़ जाती और न देखने पर लगता जैसे कुछ खोया है. और “वो”. वो तो मुझसे जयादा मुझसे प्यार करता था. इतना खुबशुरत लड़का मुझे इतना प्यार करता था. मेरी न तो रंग थी, और न ही जयादा सुन्दरता.

मै कभी-कभी दुसरे से भी बात कर लेती. एक friend की तरफ. मगर उस से कभी नहीं बताई. हमेशा उस से छुपा कर रखी. कभी मिलने भी जाती तो अपना whats up और Facebook का data डिलीट कर देती.

usne mujhe chod diya

मैं उसके साथ वफ़ा नहीं करी पाई. क्यों? पता नहीं, शायद मैं गलत रही जो उसे छोड़कर दुसरे से जा मिली. जो लड़का मेरे लिए रोया, मेरे गलती पर गलती करने के बाद भी माफ़ किया मैंने उसे छोड़ दिया. किसी ऐसे के लिए जो मेरा था ही नहीं, न ही होगा. मैं ऐसा क्यों कर गई? क्या मुझे नौकरी मिलने का नशा चढ़ गया था या मुझे ख्याल ही नहीं था क्या कर रही हूँ. जवाब आज भी ढूंडती हूँ तो “आखो में बस पानी छलक जाता है”. और दिल बस इतना ही कह पाता है – “प्यार में दगा दिया मैंने.”

कभी कभी आपको कोई इतना अच्छा लगने लगता है की बस उसे पाने की तम्मना हो जाती है. मेरे साथ भी वैसे ही हुआ. जब मैंने उससे देखा था बस यही सोची थी यह लड़का मुझे मिल जाए. संयोग कहे या भाग्य ‘भगवन’ ने मेरी सुन ली थी. हमलोग धीरे-धीरे दोस्तो हो गए. फिर एक दिन मैंने उसे प्रपोज भी कर दिया. और उसने भी तुरंत ही “हाँ” कर दिया.

lambi dori bardas nahi hota

इस बार दोनों ने हिम्मत दिखाई. दोनों ने अपने पति और पत्नी से तलाक ले लिए. और एक दुसरे के हो गये. अब उनमे ख़ुशी था. अब वो जवान नहीं रहे. न ही वह जवानी रही. मगर प्यार वही था. उस प्यार का एहसास अब भी वही था. उनका हर दिन एक नया दिन था. उसने वर्षो का जुदाई एक जमना बित जाने जैसे था. अब उनको किसी चीज का कमी नहीं था. प्यार उनके साथ था.. उस से बड़ी चीज और क्या चाहिए थे. दोनों ने भगवान् की शुकिया अदा किया और बोले हे ऊपर वाले तेरे घर देर है अंधेर नहीं.

duri sahi jayena

समय बिताता गया. नेहा के बच्चे हो गये और प्रकाश के भी. मगर न ही नेहा अपने पति के साथ खुश थी और न ही प्रकाश अपनी पत्नी के साथ. उनका आपस में हमेशा झगडा होते रहता. अभी भी न ही नेहा, प्रकाश को भुला पाई और न ही प्रकाश नेहा को. प्रकाश की वाइफ बहुत ही सुंदर थी फिर भी वह उस से खुश नहीं था. और उस से दिल भी नहीं लगा पाया.

समय के साथ दोनों के बच्चे बड़े हुए और उनके शादी भी हो गये. एक-दुसरे से बिछड़े काफी समय हो गया. समय काफी तेजी से बढ़ रहा था. इन्टरनेट की दुनियाँ आ गई थी. दोनों Facebook पर friend बन गये. उनके बिच बाते होने लगी. दोनों एक दुसरे से घंटो बात करते वो सारी बाते जो वर्षो पहले हुई थी वो होने लगा. इतने दिनों से दबा हुआ प्यार बहार आने लगा.

yar se dur manjur nahi

प्रकाश और नेहा कभी एक-दुसरे का चेहरा देखे बिना नहीं रहा पाते. बाते तो हमेशा होता ही रहता था. कभी प्रकाश call नहीं कर पता तो नेहा का call तुरंत ही आ जाता. कहाँ हो क्या कर रहे ठिक हो न. वैसे ही हल प्रकाश का भी था. दोनों एक दुसरे के साथ जीने मरने की कसमे खाई. कभी ना छोड़ने का वादा दिया. दोनों अपना love लाइफ एन्जॉय कर रहे थे. मगर इस उजाले के बाद अँधेरा आना बाकी था.

नेहा के घर वाले उस पर शादी के लिए दबाव डालने लगे. मना करने के बाद भी उसकी शादी कही और ठिक हो गई. और एक दिन शादी भी हो गई. दोनों एक दुसरे से जुदा हो गये. प्रकाश का भी शादी हो गया. उसका शादी एक बहुत ही सुंदर लड़की से हुआ. मगर उनका दिल न मिल पाया. प्रकाश हमेशा नेहा की यादो में ही खोया रहता. दिन भर उसे याद करता और उदास रहता.

fir wo dur chale gaya

हमारी love story शुरू हो चुकी थी. जहाँ भी स्टेशन आता हमलोग आकर एक दुसरे से मिलते. फिर अपने अपने सिट पर चले जाते. ऐसे ही हमारा सफर कटता रहा. रास्ते का पता ही नहीं चल रहा था. सारा समय खुशी से बीत रहा और इतना लम्बा सफर हमने ऐसे ही काट दिया. जल्द ही वह स्टेशन आ गया. जहाँ हमे उतरना था. वह भी उतर गया और हम भी. वहाँ उनको कही और जाना था.

हमारी मुलाकात अब नहीं होने वाली थी. क्यों की हमारा घर दुसरे स्टेट में था और उसका दुसरे स्टेट में. मैं नजरे उठाकर उसे देखा. वह भी उदास मन से मुझे देख रहा था. मिलकर अब दूर जाने का मन नहीं कर रहा था. फिर उसकी ट्रेन आई और वह चला गया. मैं उस से देखते रह गई. हमारा प्यार का समय भले ही छोटा हो मगर हमदोनो इस पल की जीवन में कभी नहीं भूलेंगे. प्यार दिल में हमेशा ऐसे ही रहेगा. चाहे कितनी भी दूरियां आये.

mulakat wo khas tha

उसके जवाब ने मेरे चेहरे पर मुस्कान ला दिया. रब भी किस से कब मिलये पता नहीं चलता. शायद वह मेरे लिए ही चला था. उसे भी वही ट्रेन पकडनी थी जो हमलोग पकड़ने वाले थे.

हमलोग के बातो का सिलसिला चल पड़ा. मैंने उसका number भी ले लिया. जल्द ही हमारा स्टेशन भी आ गया. जहाँ से हमलोग की गाड़ी change करना था. मगर अब कोई डरने की बात नहीं थी क्योंकि हमलोग एक दुसरे को जान गये थे. और इतना लम्बा सफर साथ ही तो जाना था. मैं बहुत खुश थी.

वह पढने के लिए हमारे शहर में रहता था. और गर्मी की छुट्टी के लिए अपने घर जा रहा था. उसकी दो गाड़िया पहले छुट चुकी थी क्यों की उसमे उसका टिकट नहीं हुआ था. शायद भगवान भी हमे मिलाना चाहते हो. मगर इसमें एक दिक्कत आ गई. उसका सिट, स्लीपर में था जबकि हमारा AC में था. मैं सोच कर थोड़ी उदास हो गई. मगर ख़ुशी भी था की कम-से-कम एक ट्रेन में तो है.

train me hua sab suru

ट्रेन अब भी अपने रफ्तार से चल रही थी. हमलोग को कही और जाना था शादी में. इसलिए इस ट्रेन को छोड़ कर दूसरी ट्रेन पकड़ना था. स्टेशन आने में बस कुछ ही समय बचा था. लगभग आधा घंटा बचा होगा. उसके दिल में क्या चल रहा था पता नहीं मगर मैं उसे अपना दिल दे चुकी थी. पहली नजर का प्यार हो गया था मुझे उस से. मैं उस से बात करना चाहती थी क्योंकि मुझे पता था की स्टेशन जल्द ही आ जाएगा. मैं जाकर उसके बगल वाली सिट पर बैठ गई. वह अब भी ऐसे ही शांत बैठा था. बिना किसी भाव के.

“हाय, कहाँ जा रहे है” मैंने बात शुरू करते हुए बोली.

“जी” उसने मेरी तरफ देखा और अनसुने भाव से बोला.

“आप कहाँ जा रहे है.” मैंने अपना बात फिर से दोहराई.

“मैं तो बहुत दूर जा रहा हूँ.” उसने मेरे तरफ देखते हुए बोला –“अगले स्टेशन पर जाकर मुझे गाड़ी change करनी है.”

मेरे दिल में कुछ हुआ. क्योंकी मुझे भी अगले स्टेशन से गाड़ी change करनी थी.

“कौन सी गाड़ी पकडनी है.” मैंने उसे दुबारा पूछी.

train ka pyar

जनशताब्दी अपने तेज रफ्तार से चल रही थी. छोटी-छोटी स्टेशन हवा में ही पार हो जा रहे थे. मैं, मेरी मम्मी और पापा chair यान में बैठे थे. तभी हमारे पास ही एक छोटी सी बच्ची ने उलटी कर दी. कुछ छीटे मेरे पर भी आ गया. उसे देख कर मुझे भी उलटी जैसा होने लगा. मैं जल्द ही वहाँ से हट गई और कपड़ो पर पड़े छीटे धोने के लिए वाश बेसिन के तरफ चली गई.

तभी मेरी नजर एक लड़के पर गई. उस डिब्बे के सबसे अंतिम सिट पर वह बैठा था. कुछ गुमसुम, अकेला. जैसे किसी सोच में हो, बहुत भारी उदास मन में लेकर बैठा हो. मैं अपने कपड़ो पर पड़े छीटे धो कर आ गई. मगर उस लड़के से आगे मेरे पैर बढ़ ही नहीं रहे थे. उसके बड़ी-बड़ी आँखे गोरा गाल, बिलकुल क्यूट लग रहा था. मैं बस उसे देखते जा रही थी. और वो कभी देखता और कभी अपने नजरे झुका लेता. मैं उसके दुसरे तरफ वाली सिट से दो सिट आगे जा कर बैठ गई. मैं वहाँ जाना नहीं चाहती थी. मैं उसे बस देखते रहना चाहती थी.

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“उस टाइम पता नहीं था क्या बोल रही हूँ. गलती हो गई थी. और हाँ मुझे call भी मत करना. क्यों उनको पसंद नही है मैं किसी से बात करू.”

मैंने उसके चेहरे पर देखा. दर्द का एक सिकन भी नही था उसके चेहरे पर. मैंने उसे रोकना चाहा. वो आगे निकल गई थी. मैंने जोर से आवज लगाई – “रुक तो जाओ मेरी बात तो सुनो. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. सुनो………..”

“किसे रुका रहा है. इतने सुबह-सुबह.” कोई मेरे पीठ पर हाथ रखते हुए बोला.

मैंने सर उठाया. सवेरा होने वाला था. अब न तो कोई लाउडस्पीकर बज रहा था. न ही कही शोर हो रहा था. ठण्ड से पंछी भी अपने घोश्ले में सो रखे थे. मैं भी अपनी आखें पोछते हुए धीरे-धरे अपने घर को चल दिया.

true love story – एक दर्द भरी रात की कहानी

मैं धीरे से छत से उतरा और खेत

मैं धीरे से छत से उतरा और खेत के तरफ जाने लगा. मैं इन शोरो से दूर जाना चाहता था बहुत दूर. शर्दी की अंधरी रात में कहा जा रहा हूँ पता नही चल रहा था. बस चले जा रहा था. ठंडक में भी मुझे पसीने आ रहे थे. मैंने अपना कदम और तेज कर दिया.. मैं जितना दूर जा रहा था आवाज मेरा उतना ही पीछा कर रही थी.

अब मैं गावं से बहार आ चूका था. आवाज पहले से और साफ़ आ रहा था. शादी का रस्म चल रहा है. मैंने दोनों कान बंद किया और वही बैठ गया. निचे क्या है क्या नहीं क्या फर्क पड़ता है. अचानक मेरा मेरा मुह खुला और मैं चीख-चीख कर रोने लगा. और तेज और तेज. कितने दिनों से दबा रखा इन आंसुओ को. आज जी भर के बहार निकलना चाहता था. वहाँ न कोई सुनने वाला था कोई कुछ कहने वाला. रोता ही रहा- रोता ही रहा. जब तक सारे जहर भरे आंसू बाहर नहीं निकल गए.

हल्का मन फिर से उसके यादो में खोने लगा.

“ये हाथ में क्या ली हो” मैंने उसको आते हुए देखा तो पूछा.

“मेरा शादी का कार्ड है.” उसने कार्ड मुझे थमाते हुए बोली- “मेरा शादी हो रहा है.”

“तुम पागल हो गई हो क्या? तुम्हारा शादी ठिक हो रहा और तुम मान गई.” मैं तो पागल हो गया था. वहाँ हो क्या रहा है समझ के बाहर था.

“घर वालो ने ठिक किया है. मैं मना नहीं कर सकती.”

मैंने उसके घर के तरफ देखा.

मैंने उसके घर के तरफ देखा. चारो तरफ एक जगमगाती लाइट जल रही रही थी. चहल-पहल ज्यादा लग रहा था. घर और आप-पास के पेड़ो में लगे लाउडस्पीकर में बड़े जोर-जोर से हिंदी गाने बज रहे थे. वहां से 50 मीटर की दुरी पर मैं अपने छत पर अँधेरे में बैठा था. मैं नहीं चाह रहा था कोई मुझे देखे और मेरे दर्द को. जिसे देखना था वह अपने खुशियों में व्यस्त था. गाने मेरे दिल में तीर के जैसे चुभ रहे थे. अंदर से एक बेचैनी खाए जा रही थी. क्या करू, न ही दिल बस में था न मन. धडकन भी अपनी सबसे तेज रफ्तार में थी. जैसे आज ही सब खत्म कर देना है. एक पल को मन किया चले जाऊ उसके पास और पुछू “क्या हक़ है. तुमको किसी को रुलाने का.”

इस बार दोनों ने हिम्मत दिखाई

इस बार दोनों ने हिम्मत दिखाई. दोनों ने अपने पति और पत्नी से तलाक ले लिए. और एक दुसरे के हो गये. अब उनमे ख़ुशी था. अब वो जवान नहीं रहे. न ही वह जवानी रही. मगर प्यार वही था. उस प्यार का एहसास अब भी वही था. उनका हर दिन एक नया दिन था. उसने वर्षो का जुदाई एक जमना बित जाने जैसे था. अब उनको किसी चीज का कमी नहीं था. प्यार उनके साथ था.. उस से बड़ी चीज और क्या चाहिए थे. दोनों ने भगवान् की शुकिया अदा किया और बोले हे ऊपर वाले तेरे घर देर है अंधेर नहीं.

प्रकाश और नेहा कभी एक-दुसरे का

प्रकाश और नेहा कभी एक-दुसरे का चेहरा देखे बिना नहीं रहा पाते. बाते तो हमेशा होता ही रहता था. कभी प्रकाश call नहीं कर पता तो नेहा का call तुरंत ही आ जाता. कहाँ हो क्या कर रहे ठिक हो न. वैसे ही हल प्रकाश का भी था. दोनों एक दुसरे के साथ जीने मरने की कसमे खाई. कभी ना छोड़ने का वादा दिया. दोनों अपना love लाइफ एन्जॉय कर रहे थे. मगर इस उजाले के बाद अँधेरा आना बाकी था.

नेहा के घर वाले उस पर शादी के लिए दबाव डालने लगे. मना करने के बाद भी उसकी शादी कही और ठिक हो गई. और एक दिन शादी भी हो गई. दोनों एक दुसरे से जुदा हो गये. प्रकाश का भी शादी हो गया. उसका शादी एक बहुत ही सुंदर लड़की से हुआ. मगर उनका दिल न मिल पाया. प्रकाश हमेशा नेहा की यादो में ही खोया रहता. दिन भर उसे याद करता और उदास रहता.